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Chhayavadottar Hindi Kavya : B.A. ( Hindi Hns. ) Part Ii Ke Liye

Chhayavadottar Hindi Kavya : B.A. ( Hindi Hns. ) Part Ii Ke Liye

Author(s): Dinesh Prasad Singh and Dilip Ram
Publisher: Motilal Banarsidass
Language: Hindi
Total Pages: 55
Available in: Paperback
Regular price Rs. 125.00
Unit price per

Description

छायावादोत्तर हिंदी काव्य (Chhayavadottar Hindi Kavya) का अध्ययन भारतीय काव्य साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह काव्य धारा छायावाद (Chhayavad) के बाद, विशेषकर 20वीं सदी के उत्तरार्ध में विकसित हुई, जो आधुनिक हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। इस काव्य धारा में समाज, व्यक्तित्व, और समय के बदलते प्रभावों को प्रदर्शित किया गया।

1. छायावादोत्तर काव्य का स्वरूप

छायावादोत्तर काव्य में छायावाद की रोमांटिक प्रवृत्तियों से अलग, वास्तविकता, समाजवाद, राजनीतिक जागरूकता, और नई चेतना को प्रमुखता दी गई। इस काव्य में मूल्य, संघर्ष, मानवता और समाज में हो रहे परिवर्तन की छाया साफ तौर पर दिखती है।

छायावादोत्तर काव्य में यथार्थवाद, नया कविता आंदोलन और नवकाव्यशास्त्र जैसी धाराओं का उदय हुआ। कवि अब केवल व्यक्ति के मनोभावों और काल्पनिक चित्रों को प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि समाज, राजनीति और समय के बदलते हालातों पर भी कविता के माध्यम से टिप्पणी करते हैं।

2. प्रमुख कवि और उनके काव्य

छायावादोत्तर हिंदी काव्य के प्रमुख कवियों में शामिल हैं:

  1. निराला (Nirala) - निराला का काव्य छायावाद के बाद के यथार्थवादी आंदोलन को लेकर आगे बढ़ा। उनका काव्य समाज और व्यक्तित्व की समस्याओं पर आधारित था। उन्होंने अपने काव्य में आदर्शवाद और यथार्थवाद को संतुलित किया। उनके काव्य में राष्ट्रीयता, समाजवाद और धार्मिक चेतना की झलक मिलती है।

  2. दिनकर (Dinkar) - दिनकर का काव्य अधिकतर राष्ट्रवाद और वीरता से संबंधित है। उनकी कविताएँ देशभक्ति, समाजवाद, और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा देती हैं। उनका "रश्मिरथी" और "काव्यशास्त्र" जैसे काव्य ग्रंथ साहित्य में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

  3. सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) - पंत जी का काव्य मूलतः प्रकृति प्रेम, आध्यात्मिकता, और मानव जीवन के शुद्ध विचारों से संबंधित है। उन्होंने छायावाद के प्रवृत्तियों को बनाए रखा, परंतु उन्होंने समाज और मानवता के उद्देश्य को भी प्रमुख बनाया।

  4. प्रसाद (Prasad) - महादेवी वर्मा और प्रसाद के काव्य में एक मिश्रित दर्शन, भावनाओं का संयोजन और आध्यात्मिकता का संगम था। उनका साहित्य दर्शन और जीवन के सुंदर रूपों को प्रकट करने वाला था।

  5. फणीश्वरनाथ रेणु (Phanishwar Nath Renu) - उनका काव्य भारतीय ग्राम्य जीवन, किसान संघर्ष, और समाज में हो रहे परिवर्तन को स्पष्ट करता है। उनका लेखन ग्रामीण जीवन की वास्तविकता और मनुष्य के संघर्ष को व्यक्त करता है।

3. छायावादोत्तर काव्य का विशेष महत्व

छायावादोत्तर काव्य में यथार्थ और समाज के कड़े मुद्दों पर चर्चा की गई। यह काव्य समाज की दुःख-तकलीफों, वर्गीय भेदभाव, और राजनीतिक असंतुलन को स्पष्ट करता है। साथ ही, कवियों ने व्यक्तिगत संवेदनाओं के साथ-साथ समाज के यथार्थ को भी प्रस्तुत किया।

इसके अलावा, नई कविता आंदोलन, प्रगतिवाद, सामाजिक यथार्थवाद, और कविता के प्रयोगात्मक रूप जैसे पहलुओं ने इस काव्य धारा को और भी समृद्ध किया।

4. प्रमुख काव्य प्रवृत्तियाँ

छायावादोत्तर हिंदी काव्य की कुछ प्रमुख प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  1. सामाजिक यथार्थवाद – समाज में हो रहे बदलावों, असमानताओं, और संघर्षों को व्यक्त करने की प्रवृत्ति।
  2. नव कविता – आधुनिकता और प्रयोग की ओर झुकी हुई काव्य धारा, जिसमें शब्द, प्रतीक और छंद के नए रूप अपनाए गए।
  3. प्रगतिवाद – यह काव्य दिशा समाज के विकास और समृद्धि की ओर प्रेरित करता है।
  4. धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद – कविता में भारतीय संस्कृति और समाज के सम्मान और समृद्धि का चित्रण।