
संस्कृत शास्त्रकारण पर्यावरणविमर्श (Sanskritshashtrakarana Paryavaranvimarsha) का मतलब है, पर्यावरण के बारे में संस्कृत शास्त्रों में दी गई समझ और विचारों का विश्लेषण। इस विमर्श में यह देखा जाता है कि प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, जैसे वेद, उपनिषद, पुराण, और अन्य धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों में पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण के संदर्भ में क्या विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
संस्कृत शास्त्रों में पर्यावरण से जुड़ी कुछ प्रमुख बातें:
प्रकृति और जीवन का संबंध:
संस्कृत शास्त्रों में यह माना जाता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध गहरे और परस्पर निर्भर है। वेदों में प्रकृति को देवी के रूप में पूजा जाता है, जैसे पृथ्वी (भूमि), जल (आप), आकाश (आकाश), अग्नि (आग) और वायु (वायु)। इन तत्वों का सम्मान और संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है।
वेदों में पर्यावरण संरक्षण:
वेदों में पृथ्वी और उसके संसाधनों को जीवन के लिए आवश्यक और पवित्र माना गया है। "सत्यमेव जयते" जैसी बातें वेदों में निहित हैं, जो सत्य, पर्यावरण और जीवन के संतुलन को महत्व देती हैं। ऋग्वेद में पृथ्वी को माता के रूप में पूजा गया है और जल को शुद्धता और जीवन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उपनिषदों में प्रकृति का आदर्श:
उपनिषदों में यह कहा गया है कि व्यक्ति को अपनी आत्मा के साथ प्रकृति की आत्मा को भी पहचानना चाहिए। यह एक अदृश्य संबंध है जो हर जीव और प्राकृतिक तत्व के बीच है। यहां पर जैव विविधता और जीवन के विविध रूपों का सम्मान करने की बात की गई है।
पुराणों में पर्यावरण का महत्व:
विभिन्न पुराणों में यह वर्णन है कि किस तरह से मनुष्यों को प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग करने से बचना चाहिए। पुराणों में प्राकृतिक आपदाओं को पर्यावरणीय असंतुलन से जोड़कर समझाया गया है, जैसे कि महाभारत में कृष्ण का उपदेश जिसमें उन्होंने संसार को प्राकृतिक और शाश्वत नियमों के तहत जीवन जीने की सलाह दी।
धर्मशास्त्रों में पर्यावरणीय आचार:
मनुस्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों में यह निर्देशित किया गया है कि पर्यावरण का संरक्षण केवल धर्म का पालन नहीं बल्कि समाज का कर्तव्य है। मनुष्य को प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह सृजनात्मक और पोषक बनी रहे।
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